विष्णु द्वारा मधु-कैटभ का वध
विष्णु द्वारा मधु-कैटभ का वध
विष्णु की सुंदरता का वर्णन
मार्कण्डेय जी कहते हैं-
युधिष्ठिर! ब्रह्माजीके प्रकट होने के कुछ साल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवों ने सर्वसामर्थ्यवान भगवान श्री हरि को देखा।
👉वे शेषनाग के शरीर की दिव्यशयया पर शयन करते हैं, उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनों की है।
👉 भगवान के मस्तक पर किरीट और कण्ठ में कौस्तुभमणि की शोभा हो रही थी
उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था। राजन। वे अपनी कान्ति और तेज से उद्वीप्त हो रहे थे। शरीर वे सहस्त्रों सूर्यों के समान प्रकाशित होते थे। उनकी झांकी अभ्दुत और अनुपम थी।
👉भगवान को देखकर मधु और कैटभ दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ।
मधु-कैटभ द्वारा ब्रहमा को डराने का प्रयत्न
तत्पचात उनकी दृष्टी कमल में बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्मा जी पर पड़ी उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्मा जी को डराने लगे। उन दोनों के द्वारा बार-बार डराये जाने पर महायशस्वी ब्रह्मा जीने उस कमल की नाल को हिलाया।
मधु-कैटभ का भगवान गोविन्द से संवाद
इससे भगवान गोविन्द जाग उठे। जागने पर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवों को देखा। उन महाबली दानवों को देखकर भगवान विष्णु ने कहा- ‘तुम दोनों बड़े बलवान हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनों को उत्तम वर दे रहा हूं; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है’।
महाराज। वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे।
उन्होंने हंसकर इन्द्रियों के स्वामी भगवान मधुसूदन से एक साथ कहा।
‘सुरश्रेष्ठ। हम दोनों वर देते हैं। देव। तुम्हों हम लोगों से वर मांगो। हम दोनों तुम्हें तुम्हारी इच्छा के अनुसार वर देंगे। तुम बिना सोचे-विचारे जो चाहो, मांग लो’। श्री भगवान बोले- वीरों। मैं तुम से अवशय वर लूंगा। मुझे तुम से वर प्राप्त करना अभीष्ट है: क्योंकि तुम दोनों बड़े पराक्रमी हो। तुम्हारे- जैसा दुसरा कोई पुरुष नहीं है। सत्यपराक्रमी वीरो। तुम दोनों मेरे हाथ से मारे जाओ। मैं सम्पूर्ण जगत के हित के लिये तुम से यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ। मधु और कैटभ ने कहा- पुरुषोत्तम। हम लोगों ने पहले कभी स्वच्छन्द[2]बर्ताव में भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समय में तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं आप हम दोनों को सत्य और धर्म में अनुरक्त मानिये। बल, रुप, शौर्य और मनोनिग्रह में हमारी समता करने वाला कोई नहीं है। धर्म, तपस्या, दान, शील, सत्व तथा इन्द्रिय संयम में भी हमारी कहीं तुलना नहीं है। किंतु केशव। हम लोगों पर यह महान संकट आ पहुँचा है। अब आप भी अपनी कही हुई बात पूर्ण कीजिये। काल का उल्लड़न करना बहुत ही कठिन है।
देव। सुरश्रेष्ठ। विभो। हम दोनों आप के द्वारा एक ही सुविधा चाहते हैं। वह यह है कि आप इस खुले आकाश में ही हमारा वध कीजिये। सुन्दर नेत्रों वाले देवेश्रवर। हम दोनों आप के पुत्र हों। हमने आप से यही वर मांगा है। आप इसे अच्छी तरह समझ ले। सुरश्रेष्ठ देव। हम ने जो प्रतिज्ञा की है, वह असत्य नहीं होनी चाहिये। श्री भगवान बोले- बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करुंगा यह सब कुछ[3] होगा। भगवान विष्णु ने बहुत सोचने पर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वी भी जब उन्हें कोई खुली जगह न दिखायी दी, तब महायशस्वी देवेश्रवर मधुसूदन ने अपनी दोनों जांघों को अनावृत[4]देखकर मधु और कैटभ के मस्तकों को उन्हीं पर रखकर तीखी धार वाले चक्र से काट डाला।[5]
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